मुरैना। बड़े जैन मंदिर में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए जैनाचार्य अभिनंदनसागरजी महाराज के परम प्रभावक आज्ञानुवर्ती शिष्य आचार्यश्री उदारसागरजी महाराज ने कहा कि जब-जब अधर्म बढ़ता है, तब-तब धर्म का प्रकाश मानवता को सही दिशा देने के लिए प्रकट होता है। उन्होंने कहा कि धर्म किसी संप्रदाय या बाहरी आडंबर का नाम नहीं, बल्कि आत्मा को उसके शुद्ध स्वरूप का बोध कराने वाली दिव्य साधना है।

धर्म से मिलता है आत्मकल्याण का मार्ग

आचार्यश्री ने कहा कि जिस प्रकार एक छोटा दीपक भी घोर अंधकार को दूर कर देता है, उसी प्रकार धर्म का एक छोटा संस्कार भी मनुष्य के जीवन को नई दिशा प्रदान कर सकता है। धर्म मनुष्य को सत्य, अहिंसा, क्षमा, दया, करुणा, संयम और आत्मानुशासन का मार्ग सिखाता है। उन्होंने कहा कि आज भौतिक संसाधनों की वृद्धि हुई है, लेकिन मानसिक शांति का अभाव बढ़ता जा रहा है। वास्तविक विजय अपने राग, द्वेष, क्रोध, मान, माया और लोभ पर नियंत्रण प्राप्त करना है।

दीपक के उदाहरण से समझाया धर्म का महत्व

आचार्यश्री ने एक प्रेरक दृष्टांत सुनाते हुए बताया कि जैसे अंधकार रहने तक दीपक जलता रहता है, उसी प्रकार जब तक मनुष्य के भीतर अज्ञान, मोह और कषायों का अंधकार बना रहता है, तब तक धर्म-साधना आवश्यक है। आत्मा के वास्तविक स्वरूप की प्राप्ति तक धर्म का निरंतर अभ्यास करते रहना चाहिए।

दिखावे का धर्म नहीं, निर्मल भाव आवश्यक

धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनिश्री उपशांतसागर महाराज ने कहा कि सम्यग्दर्शन मोक्षमार्ग का प्रथम सोपान है। सच्चा धर्म बाहरी प्रदर्शन में नहीं, बल्कि निर्मल भाव, विनम्रता, आत्मचिंतन और संयमपूर्ण आचरण में निहित है। उन्होंने कहा कि लोक-प्रशंसा या मान-सम्मान के लिए किया गया धर्म आत्मकल्याण का कारण नहीं बनता।

गुरु, शास्त्र और धर्म के प्रति श्रद्धा का संदेश

मुनिश्री ने कहा कि धर्मात्मा व्यक्ति देव, शास्त्र और गुरु के प्रति निष्कपट श्रद्धा रखता है तथा साधु-संतों की सेवा और संयम चर्या में सहभागी बनकर अपने जीवन को सार्थक बनाता है। श्रद्धा और समर्पण के साथ किया गया धर्म ही मोक्षमार्ग की ओर अग्रसर करता है।

नई प्रवचन श्रृंखला का हुआ शुभारंभ

धर्मसभा में बड़ी संख्या में साधर्मी बंधु, माताएं, बहनें एवं युवा उपस्थित रहे। सभी ने धर्म, सम्यग्दर्शन, संयम और सदाचार को जीवन में अपनाने का संकल्प लिया। आचार्यश्री ने घोषणा की कि आज से प्रवचनों की नई श्रृंखला प्रारंभ हो रही है तथा सभी श्रद्धालुओं से नियमित रूप से धर्मसभा में उपस्थित होकर जिनेन्द्र वाणी का श्रवण करने का आग्रह किया।