दोहे भारतीय साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा हैं, जो संक्षिप्त और सटीक रूप में गहरी बातें कहने के लिए प्रसिद्ध हैं। दोहे में केवल दो पंक्तियां होती हैं, लेकिन इन पंक्तियों में निहित अर्थ और संदेश अत्यंत गहरे होते हैं। एक दोहा छोटा सा होता है, लेकिन उसमें जीवन की बड़ी-बड़ी बातें समाहित होती हैं। यह संक्षिप्तता के साथ गहरे विचारों को व्यक्त करने का एक अद्भुत तरीका है। दोहों का रहस्य कॉलम की 116वीं कड़ी में पढ़ें मंजू अजमेरा का लेख...
लीक पुरानी को तजे, कायर कुटिल कपूर।लीख पुरानी पर रहे, शातिर सिंह सपूत॥"

यह दोहा केवल एक सांस्कृतिक या धार्मिक संदेश नहीं है, बल्कि यह जीवन के मूलभूत सिद्धांतों की पैरवी करता है — सत्य, धर्म और मूल्यों की अविचल धारा की। इसमें कवि यह स्पष्ट करते हैं कि जो व्यक्ति पुरानी, परखी हुई और सिद्ध “लीक” (मार्ग) को छोड़ देता है, वह या तो कायर, कपटी, या घमंडी होता है।

दोहा का विस्तार:

. "लीक पुरानी को तजे" – परंपरा से विमुख होना:

कवि यहाँ "लीक" शब्द का प्रयोग उस मार्ग के लिए कर रहे हैं जो युगों से तपस्वियों, साधकों, संतों और सत्पुरुषों द्वारा चला गया है — सत्य, धर्म, आत्मानुशासन और सेवा का मार्ग।

जो व्यक्ति उस मार्ग को त्याग देता है:

या तो कायर है — जो कठिनाइयों से डरकर पीछे हट जाता है।

या कुटिल (कपटी) है — जो छल, धोखा और लाभ के लिए उस मार्ग से मुंह मोड़ लेता है।

या कपूर (अहंकारी) है — जो अपने घमंड में पुरानी बातों को तुच्छ समझता है, लेकिन स्वयं अस्थिर और जलने वाला होता है।

"लीख पुरानी पर रहे" – मूल्यों पर अडिग रहना:

इसके विपरीत, वे लोग जो पुरानी लीक पर टिके रहते हैं:

वे सिंह जैसे पराक्रमी हैं — जो चुनौतियों से घबराते नहीं।

वे सपूत हैं — जो समाज, संस्कृति और धर्म की विरासत को आगे बढ़ाते हैं।

वे शातिर (दूरदर्शी/चतुर) हैं — जो जानते हैं कि स्थायित्व और सफलता उन्हीं मूल्यों में है जो समय की कसौटी पर खरे उतरे हैं।

आधुनिक सन्दर्भ में प्रासंगिकता:

आज के दौर में जहाँ लोग हर बात को “पुराना बनाम नया” की कसौटी पर तौलते हैं, यह दोहा हमें स्थायित्व और निष्ठा का पाठ पढ़ाता है। आधुनिकता जरूरी है, लेकिन मूल्यविहीन आधुनिकता केवल खोखली चमक है।

सच्चा व्यक्ति वह है जो सुविधा या दिखावे के लिए अपने मूल्यों को नहीं छोड़ता।

जो बार-बार मार्ग बदलता है, वह लक्ष्य से भटकता है।

लेकिन जो एक ही आध्यात्मिक और नैतिक मार्ग पर अडिग रहता है, वही अंततः सफल होता है।

आध्यात्मिक संदर्भ:

आध्यात्मिक मार्ग में यह दोहा एक बहुत महत्वपूर्ण शिक्षा देता है:

साधना, गुरु की सेवा, व्रत, ध्यान, सत्यवादिता — ये सब पुरानी लीकें हैं, लेकिन यही आत्मा को परमात्मा से जोड़ने वाले सेतु हैं।

जो साधक इनसे हटकर बार-बार पथ बदलता है, वह लक्ष्य तक नहीं पहुँचता।